भारत एक विशाल देश है जिसमें बहुत सी भाषाएँ बोली जातीं हैं। भारत में पाए जाने वाले पेड़-पौधों एवं फूलों के नाम भी अलग-अलग भाषाओं एवं क्षेत्रों में अलग-अलग हैं भारत में पादप अध्ययन प्रागैतिहासिक काल से चला आ रहा है। आयुर्वेद विज्ञान के अंतर्गत सहस्त्रों पौधों के आकार, प्राप्तिस्थान तथा उनके गुणों के बारे में कई हजार वर्ष पूर्व किए गए उल्लेख मिलते है। भारत का लगभग १९ प्रतिशत भूभाग वनों से ढका है। उत्तम कोटि के पादप, जैसे अनावृतबीजी तथा आवृतबीजी की लगभग ३०,००० जातियाँ इस देश में पाई जाती हैं।

भारत के वानस्पतिक क्षेत्र

वनस्पति के विस्तार तथा प्रकार के विचार से भारत को कई वानस्पतिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जो मुख्यत:

(१) पश्चिमी हिमालय,

(२) पूर्वी हिमालय,

(३) सिंध का मैदान,

(४) गंगा का मैदान,

(५) असम क्षेत्र,

(६) मध्य भारत तथा दख्खन और

(७) मलाबार हैं।

इनके अतिरिक्त अंदमान द्वीपसमूह भी एक अलग वनस्पति क्षेत्र है।

हिमालय पर्वत पर पौधों के प्रकार ऊँचाई के हिसाब से बदलते जाते हैं, जैसे ३,५०० फुट के नीचे के भागों में जो गरम और नम हैं, सदाबहार के जंगल उगते हैं। इससे अधिक ऊँचे स्थानों पर नुकीली पत्तीवाले चीड़ देवदार, पोडोकार्पस, तथा चौड़ी पत्तीवाले बाँज, भुर्ज, सैलिक्स, चिनार इत्यादि पाए जाते हैं। यहाँ के एक वर्षीय छोटे पौधे भारत के अन्य भागों के पौधों से काफी भिन्न हैं। गुलाब, रसभरी, सेब, बदाम, अनार, बारबेरी इत्यादि अनेक प्रकार के पादप पाए जाते हैं। इस खंड को शीतोष्ण कटिबंध कहते हैं और यह १३,००० फुट की ऊँचाई तक विस्तृत है। इसके ऊपर ऐल्पीय क्षेत्र है, जहाँ बड़े वृक्ष नहीं उगते। घास, छोटी झाड़ी या अन्य छोटे पौधे उगते हैं। यहाँ के झाड़ीवाले चिमूल या रोडोडेंड्रॉन अपनी सुंदरता के लिये विश्वविख्यात हैं। इनके अतिरिक्त कुछ जंगली गुलाब गुलदाऊदी, पोटेंटिला, प्रिमुला, रतनजोग इत्यादि सुंदर पौधे उगते हैं। १७,००० से १८,००० फुट की ऊँचाई के ऊपर बारहों महीने बर्फ जमी रहती है, किंतु फिर भीश् कुछ पौधे, जैसे सीडम हिमालेंसी, पोटेंटला माइक्रोफिल आदि ऐस्टर की जातियाँ उगते हैं। पूर्वी हिमालय विषुवत रेखा के समीप होने से अधिक गरम और नम है, जिससे यहाँ पौधों की सघनता तथा उनके प्रकार पश्चिमी हिमालय से अधिक हैं। पइनस खासिया रोडोडेंड्रान की कुछ विशेष जातियाँ, रूबिएसिई तथा प्रिमुलेसिई कुलों के अनेक पौधे, बाँस के जंगल इत्यादि, केवल पूर्वी भाग में नहीं पाई जातीं, जैसे पाइनस लॉंजिफोलिया, पाइनस जिरारर्डियाना, क्यूप्रेसस टारुलोसा, देवदार तथा क्वरकस की जातियाँ, बाँज जैसे क्व० इनकाना या क्व० सेमकार्पीफोलिया, इत्यादि।

सिंध के मैदानी वनस्पति क्षेत्र में वर्षा कम और गरमी अधिक होने से अधिक भाग बलुआ मरुस्थल है। मिट्टी में लवण की अधिकता के कारण उपज कम है। यहाँ निम्नलिखित पादप मिलते हैं: सैल्वाडॉरा, जंद या प्रोसोपिस, पेरू या ऐकेशिया ल्यूकोफिलया, ऐ० अरेबिका, टैमरिक्स आर्टिकुलेटा, कैपैरिस, सुएडा, सलूनक, बूटी बरगद, एफिड्रा, लेप्टाडीनिआ, नागफनी, शीशम, मदार, कैलगोनम इत्यादि और कुछ घास, जैसे काँस, मूँज, स्पोरोबोलस इत्यादि।

गंगा के मैदान का उत्तर प्रदेशवाला भाग कम वर्षा का क्षेत्र, बिहारवाला भाग मध्यम वर्षा का क्षेत्र है। अधिकांश भूमि खेती के लिये उत्तम है और इसलिए अधिकांश प्राकृतिक जंगल नष्ट कर दिए गए हैं। मुख्य पादप, जिनकी खेती की जाती है, निम्नलिखत हैं: गेहूँ, चना, मटर, मक्का, जौ, बाजरा, अरहर, मूँग, मसूर, उरद, ईख कपास, सन या सनई, जूट इत्यादि। बाग बाटिकाओं में फल के वृक्ष जैसे आम, इमली अमरूद लगाए जाते हैं वनों में ऊँचे, बड़े वृक्ष स्वत: उगते है, जिनके नाम इस प्रकार हैं: आँवला, बन सागैन या लेगरस्ट्रीमिया, बबूल, बहेड़ा या टर्मिनेलिया बेलेरिका, हड़ या टर्मिनेलिया चेबुला, सिरिस या ऐलबिजिया प्रोसेरा, तथा सिरिन या एलबिजिया लेबेक, भुरकुल या हाइमिनोडिक्टयान एक्सेलसम, विजैसाल या टीरोकारपस मारसूपियम, चिलबिल या हॉलॉप्टीलिया इंटेग्रीफोलिया, गोंदनी या ब्रिडेलिया स्प०, इमली, जिगना या लैनिया कोरोमैंडेलिका, खैर या ऐकेशिया कैटेशु, बीड़ी पत्ता या तेंदू या डाइऑसिपिरॉस मेलेनोजाइलान, सलई या बॉलवेलिया सरेटा, पियार या चिरौंजी, लिसोड़ा या कॉर्डिया मिक्सा इत्यादि वृक्ष हैं बिहार राज्य के राजमहल, पारसनाथ तथा छोटानागपुर के वनों में ऊँचे ऊँचे साल या साखू के जंगल हैं। पारसनाथ की पहाड़ियाँ सीताफल या शरीफे के छोटे वृक्षों से भरी हैं। बंगाल क खाड़ी की तरफ दलदली भूमि में सुदंरवन है, जहाँ के पादप विशेष प्रकार के हैं जिन्हें मैंग्रोव, पादप कहते हैं। इसके उदाहरण हैं, :नारियल या कोकॉस नूसीफेरा, बेत्त या कैलेमस टेनुइस, ब्रूगेरा, ऐविसेनिया, ऐकैंथस इलिसिफोलियस, सीरिऑप्स, हिरिटिईरा, इत्यादि हैं। असम की पर्वतमाला संसार में सबसे अधिक वर्षावाला स्थान है। यहाँ सदाबहार प्रकार के जंगल में विविध प्रकार के ऊँचे घने वृक्ष उगते हैं। रबर की एक जाति आर्टोकारपस चैपलाशा, बहुत ऊँचे वृक्ष डिप्टेरोकारपस, सेमल या सलमालिय, भूर्ज, बाँज, बलूत, साखू या शोरिया रोबस्टा, शीशम या डैलबर्जिआ सिसू , जंगली बादाम या स्टरकूलिया, इत्यादि हैं। नम दलदली जगहों में एरिऐंथस, नरई , ्फ्रैगमाइटीज, तथा अनेक प्रकार के सेज (sedge), पाए जाते हैं। जल में एजोला, मारसिलिया, सैलविनियाँ , कमल, लिली, कुमुदनी, इत्यादि हैं। कुछ रोचक पौधे भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं, जैसे घटपर्णी, निपेनथीज खासियाना , जिसकी पत्ती सुराही के आकार की होती है। इसमें कीड़े मकोड़े फँस जाते हैं, जिन्हें यह पौधा हजम कर जाता है। इसी प्रकार का एक और पौधा ड्रॉसेरा भी पाया जाता है।

भारत के मध्य तथा दक्षिण क्षेत्रों में सागौन या टेक्टोना ग्रैनडिस और साखू के जंगल पाए जाते हैं। मैसूर के जंगल में भारत का विश्वविख्यात वृक्ष चंदन उगता है। मालाबार के भाग में जहाँ अधिक वर्षा होती है, घने जंगल पाए जाते हैं। यहाँ रबर की खेती होती है। मलाबार के समुद्रतट पर नारियल के पौधे बहुत उगते हैं, जिनसे अनेक प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

तेंदू या बीड़ी पत्ता

इसका वानस्पतिक नाम डाइऑस्पिरॉस मेलैनोजाइलान हैं, जो ऐबिनेसिई कुल का सदस्य है। यह मध्यम श्रेणी का वृक्ष है, जिसका तना टेढ़ा मेढ़ा ऐंठा होता है। उत्तर भारत के जंगलों में यह वृक्ष स्वत: बहुत उगता है। इसकी पत्ती को तोड़कर सुखा लिया जाता है और तंबाकू की पत्ती के टुकड़ों को इसमें लपेटकर बीड़ी बनाई जाती है ।

कटहल

यह बड़ा वृक्ष अर्टकेसिई कुल का सदस्य है। यह भारत के हर एक भाग में होता है। इसके कच्चे फल की तरकारी बनाकर खाई जाती है और अचार बनता है। पक्के फल का कोआ खाया जाता है। पश्चिमी तट के जंगलो में यह स्वत: उगता है।

शकरकंद

पृथ्वी के नीचे जड़ के फूलने से बनता है। 

काजू 

दक्षिण भारत में यह स्वत: उगता है तथा बाग में लगाया जाता है। इसका वृक्ष मध्यम आकार का है। इसका फल बड़ा होता है, जिसके सिरे पर एक कर्नेल होता है। उसके अंदर खानेवाला भाग होता है, जो बाजार में बिकता है। यह वृक्ष ऐनाकारडिएसिई कुल का सदस्य है।

चिरौजी

Jambolan plum, Java plum (Syzygium cumini)

यह ऐनाकारडिएसिई कुल का जंगली वृक्ष है। और उत्तर भारत के मिर्जापुर के जंगलों में स्वत: उगता है। इसका फल, जिसे जंगली लोग पियाल कहते हैं, खाया जाता है। बीज को तोड़कर चिरौंजी निकाली जाती है। यह बीज बहुत पौष्टिक होता है।

जामुन

यह ३० से ४० फुट ऊँचा वृक्ष भारत के अनेक भागों में उगता है। इसमें चौड़ी, मोटी पत्ती, सफेद पर काली चिप्पड़ जैसी छाल तथा पका हुआ काला या लाल फल होता है। इसकी अनेक जंगली जातियाँ पाई जाती हैं, जिनका, फल छोटा, कैसला तथा लाल होता है, परंतु बाग में लगाए जानेवाले वृक्ष में काले, बड़े रसभरे फल लगते हैं। फल से सिरका भी बनाया जाता है, अधिकांश फल ताजा खाया जाता है। फल गरमी के अंत तथा बरसात के शुरू में पकता है।

पलास या ढाक

इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मॉनोस्पर्मा है। लेग्यूमिनोसिई कुल का यह लघु वृक्ष भारत में मैदानी जंगलों में उगता है। इसका पुष्प अत्यंत चमकीला लाल होता है और जब जंगल के जंगल फूल से भर जाते है तो दूर से बड़ा ही सुहावना लगता है। पुष्प से पीला रंग बनाया जाता है, छाल से लाल गोंद निकलती है और पत्ते दोने तथा पत्तल बनाने के काम आते हैं।

बेल

इसका वानस्पतिक नाम इग्लिमेरमिलॉस है। रूटेसिईकुल का यह वृक्ष है, जो ३० से ४० फुट ऊँचा होता है, पत्ती तीन तीन के गुच्छों में होती है, फल बड़ा, गोल तथा कड़ा होता है, अंदर गूदा मीठा तथा पौष्टिक होता है। पेड़ पर काँटे लगे होते हैं। यह भारत में अनेक स्थानों पर लगाया जाता है और हिंदू इसे धार्मिक दृष्टि से पवित्र समझते हैं।

बबूल

इसका वानस्पतिक नाम ऐकेशिया अरेबिका है। यह मध्यम वर्ग का काँटेदार वृक्ष बलुई जमीन में नदी के किनारे अधिक उगता है। इसकी छाल से निकला गोंद बहुत अच्छा होता है। लकड़ी मजबूत होती है और बैलगाड़ी बनाने के काम आती है।

आदरणीय भारत के राष्ट्रिय नागरिक महोदय व् नागरिक बन्धुओं हमारे भरत के नागरिकों पर राज करने वाले राष्ट्रिय नागरिकों से विनम्र अपील हमारे देश का कोई भी प्रधानमंत्री अगर किसी राज्य में बीस करोड़ की मदद देने की घोषणा करते है यह तो अच्चा है परन्तु मान लो की किसी राज्य की जनता पेड़ के पत्तों के पत्तल दोने का व्यापर करने में सक्षम है तो प्रधानमन्त्री जी को यह घोषणा करने की करपा करनी चाहिए की केन्द्र सर्कार दस करोड़ नगद देगे और दस करोड़ के सालाना राज्य की जनता से पेड़ के पत्तों के पत्तल दोने खरीदेंगे फिर देश की जनता को भोज के लिए हर गैस सरेण्डर के साथ मुफ्त देंगे जो देश की जनता जल पानी बर्बादी से जानलेवा मलेरिया व जल पानी बर्बादी से स्टील के बर्तन व् स्टील के ठीकरे धोनें पर चमड़ी कटने की बीमारी न हो जो जितना आमिर आदमी उतना बरबाद क्यों उसका इलाज ही नहीं होता स्टील के बर्तन को धोने वाले की परेशानी दूर बर्तन धोने वाले को रोज लगभग दोनों समय 150 ठकरे धोने से निजात मिलेगी स्टील के बरतन को धोने से जो जल बहता है जल बहने से मलेरिया के मछरों का आतंक मिट सकता है मलेरिया की बिमारियों पर परिवार बरबाद होने में कमी आएगी दवाइयों में शासनात्मक कमीशन बाजी व घोटाले बाजी जो देश को बरबाद करने में तुली हुई ह उसमें कमी आ सकती है यह योजना हर परिवार के पास पहुचती है तो हर परिवार ६ सदस्य ४० हजार रूपये की बचत व सरकार को मलेरिया के लिए परेशानी में कमी आएगी मानव व जानवरों को एलरजी नमक बिमारियों से छुटकारा पाने में मदद मिलेगी और किसी राज्य का मुख्यमंत्री जो अपने राज्य को मेहनतकस व महत्वाकान्सी आत्म शक्तिशाली बनाना चाहता है तो अपनी राज्य की जनता को पेड़ के पत्तों के पत्तल दोने का व्यापर करवाने व पेड़ के पत्तों के पत्तल दोने में खाने का प्रचार होना चाहिए सरकारें जनता नो पेड़ के पत्तों के पत्तल दोने का व्यापर का अनुदान देगी तो उस राज्य में हरियाली की कमी कभी नहीं आएगी== महुआ == इसका वानस्पतिक नाम बैसिआ लैटीफालिया या मधुका इंडिका है। यह उत्तर भारत में हर जगह उगता है। सैपोटेसिई कुल का यह पौधा ३०-४० फुट ऊँचा होता है। इसकी लकड़ी जलाने के काम आती है तथा पत्तों से दोना पत्तल बनाए जाते हैं। इसका फूल गरमी के शुरू में झड़ता है, जो इकठ्‌टा कर खाया जाता है। इससे बहुत बड़े पैमाने पर शराब भी बनाई जाती है।

अन्य

अंजीर, अखरोट, अडूसा, अजवायन, अनन्नास, अनार, अमरूद, अमलतास, अरहर (देखें दाल), आँवला, आम, आलू, आलूबुखारा, इंद्रायण, इमली, ईख, एरंड, कमल, कपास, करंज, करमकल्ला, करेला, कालीमिर्च, केला, केसर, कुचला, कुमारी, खैर (देखें कत्था), खस, खीरा, गांजा, गाजर, गेहुँ, गोखरू, चंदन, चंपा, चाय, चीड़, जावित्री, जौ, टमाटर, तंबाकू, ताड़, तुलसी, दालचीनी, देवदार, नारियल, धान (देखें चावल), नासपाती, नीबू, नीम, पपीता, पालक, पोल, बरगद, बाँज, बदाम, बैंगन, मक्का, मेंहदी, लीची, शकरकंद, सलजम, शहतूत, संतरा, साखू तथा हल्दी।,

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